संगीत से सम्बंधित परिभाषाऐं - 3

११.) सप्तक - सात स्वरों के समूह को जब एक क्रम में कहा अथवा लिखा जाता है तो उसे सप्तक कहते है|  उदाहरण के लिए - सा, रे , ग, म, प, ध, नि यह एक सप्तक है| एक सप्तक सा स्वर से नि स्वर तक होता है|

 नि स्वर के बाद फिर से सा आता है जो पहले सा से दुगुना ऊँचा होता है| इस तरह दूसरा नया सप्तक प्रारम्भ होता है जिसके सभी स्वर पहले सप्तक के स्वरों से दुगुने ऊँचे होते है| 

ऐसे कई सप्तक संभव है परन्तु मुख्य तीन सप्तक इस प्रकार है- 

११.१) मन्द्र सप्तक - साधारण सप्तक से दुगुनी नीची आवाज को मन्द्र सप्तक कहते है| साधारण आवाज वह है जिसको गाने से हमारे गले में कोई कष्ट नहीं होता या कोई जोर नहीं लगाना पड़ता| इस साधारण आवाज से दुगुनी नीची आवाज जिसमें स्वर गाने से हृदय पर जोर पड़ता है, मन्द्र सप्तक की आवाज कहलाती है|     

११.२) मध्य सप्तक - वह आवाज जो ना अधिक ऊँची होती है, ना अधिक नीची होती है, अर्थात बीच की आवाज मध्य सप्तक की आवाज कहलाती है| इस सप्तक के स्वरों को गाने से गले पर कोई जोर या कष्ट नहीं होता| ये स्वर मन्द्र सप्तक के स्वरों से दुगुने होते है|    

११.३) तार सप्तक - मध्य सप्तक से दुगुनी आवाज को तार सप्तक की आवाज कहते है | इस सप्तक के स्वरों का उच्चारण करते हुए चिल्लाना पढता है| इस सप्तक के  गाने से तालु तथा मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है|   

               


१२.) स्वरों का स्थान (हारमोनियम या प्यानो पर)
     १२.१) सा का स्थान 
          १२.१.१) पहला काला (C# Scale) - साधारणतः पुरुषों  के लिए 



          १२.१.२) तीसरा काला (A# Scale) - 
साधारणतः महिलाओं  के लिए 


१३.) थाट - सप्तक में शुद्ध और विकृत कुल मिलकर १२ स्वर होते है| उन्हीं १२ स्वरों से थाटों की उत्पति होती है| इस प्रकार सप्तक के सातों स्वरों के क्रमानुसार समूह को थाट कहते है| थाट में सप्तक के शुद्ध तथा विकृत स्वरों में से प्रत्येक स्वर का कोई ना कोई रूप अवश्य होता चाहिए और इनमें अनेक राग उत्पन्न होने की शक्ति भी होनी चाहिए|

१४.) थाट के नियम
थाट के निम्नलिखित नियम तथा लक्षण है:-
१४.१) थाट हमेशा सम्पूर्ण होते है अर्थात उनमें सातों स्वर होते है| क्योंकि थाट से राग उत्पन्न होते है और बहुत से ऐसे राग होते है जिनमें सातों स्वर लगते है इसलिए यदि थाट में सात स्वर नहीं होंगे तो वह सात स्वर वाला राग उत्पन्न नहीं कर सकता है|   
१४.२) थाट में सप्तक के सात स्वर क्रमानुसार होने चाहिए, अर्थात - सा, रे , ग, म, प, ध, नि इस क्रम में| 
१४.३) थाट के लिए आरोह और अवरोह दोनों की आवश्यकता नहीं होती, केवल आरोह होना आवश्यक है| आरोह होने से ही थाट को पहचाना जा सकता है| 
१४.४) थाट में रंजकता की आवश्यकता नहीं होती है| रंजकता की आवश्यकता तो राग में होती है क्योंकि वह गाया जाता है| थाट गाया नहीं जाता इसलिए उसमें रंजकता की आवश्यकता नहीं है|
१४.५) थाट में अनेक राग उत्पन्न करने की शक्ति भी होनी चाहिए, इसलिए थाट जनक कहलाता है|

१५.) थाट के प्रकार 
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति में केवल १० थाट माने जाते है जो इस प्रकार है- 
१५.१) बिलावल - (सब स्वर शुद्ध) - सा, रे, ग, म, प, ध, नि       
१५.२) कल्याण - (तीव्र म) - सा, रे, ग, तीव्र म, प, ध, नि 
१५.३) खमाज - (कोमल नि) - सा, रे, ग, म, प, ध, कोमल नि
१५.४) मारवा - (कोमल रे, तीव्र म) - सा, कोमल रे, ग, तीव्र म, प, ध, नि 
१५.५) काफी - (कोमल ध, कोमल नि) - सा, रे, ग, म, प, कोमल ध, कोमल नि
१५.६) भैरव - (कोमल रे, कोमल ध) - सा, कोमल रे, ग, म, प, कोमल ध, नि  
१५.७) पूर्वी - (कोमल रे, ध, तीव्र म) - सा, कोमल रे, ग, तीव्र म, प, कोमल ध, नि   
१५.८) आसावरी - (कोमल ग, ध, नि) - सा, रे, कोमल ग, म, प, कोमल ध, कोमल नि   
१५.९) तोड़ी - (कोमल रे, ग, ध, तीव्र म) - सा, कोमल रे, कोमल ग, तीव्र म, प, कोमल ध, नि 
१५.१०) भैरवी - (कोमल रे, ग, ध, नि) - सा, कोमल रे, कोमल ग, म, प, कोमल ध, कोमल नि