१६.) वर्ण - गाने और बजाने में जो विभिन्न क्रियाएं होती है उन्हें वर्ण कहते है| गायन में स्वरों की अनेक चालें होती हैं जैसे नीचे के स्वरों से ऊपर के स्वरों तक जाने की क्रिया ओर ऊपर के स्वरों से नीचे के स्वरों की ओर जाने की क्रिया|
वर्ण कुल चार होते है -
१६.१) स्थायी वर्ण - एक ही स्वर को बार-बार उच्चारण करने को स्थायी वर्ण कहते है| स्थायी का अर्थ है स्थिर होना अर्थात एक ही स्वर पर स्थिर होने को स्थायी वर्ण कहते है| जैसे - सा सा सा, ग ग ग
१६.२) आरोही वर्ण - नीचे के स्वरों से शुरू कर ऊपर के स्वरों की ओर जाना आरोही वर्ण होता है, जैसे - सा, रे, ग, म, प, ध
१६.३) अवरोही वर्ण - ऊपर के स्वरों से शुरू कर नीचे के स्वरों की ओर जाना अवरोही वर्ण होता है, जैसे - नि, ध, प, म, ग, रे
१६.४) संचारी वर्ण - ऊपर दिए गए तीनों वर्णो को मिलाने से संचारी वर्ण की उत्पत्ति होती है| उदाहरण के लिए - रे ग प, प म, ध ध, नि ध प म, ग ग, रे म रे, ग सा|
१७.) राग
राग शब्द 'रंज' या राग 'रंगना' अथवा 'आनंद' देना धातु से उत्पन्न होता है| स्वरों तथा वर्णों की वह उत्तम रचना जिसे सुनकर आनंद की प्राप्ति होती हो, राग कहलाती है|
१८.) राग के नियम
आधुनिक समय में राग के निम्नलिखित नियम वह लक्षण माने जाते है-
१८.१) राग को किसी थाट से उत्पन्न होना चाहिए
१८.२) राग में कम से कम ५ स्वर होना आवश्यक है| |
१८.३) राग में आरोह और अवरोह दोनों का होना आवश्यक है|
१८.४) राग में वादी और संवादी स्वरों का होना आवश्यक है|
१८.५) राग में रंजकता का होना आवश्यक है|
१८.६) राग में कभी षड़ज स्वर वर्जित नहीं हो सकता है, षड़ज स्वर को आधार स्वर माना जाता है|
१८.७) राग में किसी रस की अभिव्यक्ति होनी चाहिए|
१९.) राग की जाति
राग नियम और लक्षणों के अनुसार उसमें कम से कम ५ और अधिक से अधिक ७ स्वर हो सकते है| राग में लगने वाले स्वरों की भिन्न भिन्न संख्या के कारण रागों को अलग अलग तीन वर्गों में बांटा गया है, जिन्हें राग की जाति कहते है| राग की मुख्य तीन जातियाँ है -
१९.१) सम्पूर्ण:- जिस राग में सातों स्वर लगें उसे सम्पूर्ण जाति का राग कहते है, जैसे - राग बिलावल
१९.२) षाड़व:- जिस राग में केवल ६ स्वर लगें उसे षाड़व जाति का राग कहते है, जैसे - राग मारवा
१९.३) औड़व:- जिस राग में केवल ५ स्वर लगे उसे ओड़व जाति का राग कहते है, जैसे - राग भूपाली
राग के आरोह और अवरोह में स्वरों की संख्या के आधार पर राग की तीन जातियों में से प्रत्येक को तीन उपजातियों में बांटा गया है जो इस प्रकार है -
१९.१) सम्पूर्ण
१९.१.१) सम्पूर्ण - सम्पूर्ण :- आरोह में ७ स्वर तथा अवरोह में ७ स्वर
१९.१.२) सम्पूर्ण - षाड़व :- आरोह में ७ स्वर तथा अवरोह में ६ स्वर
१९.१.३) सम्पूर्ण - औड़व :- आरोह में ७ स्वर तथा अवरोह में ५ स्वर
१९.२) षाड़व
१९.२.१) षाड़व - सम्पूर्ण :- आरोह में ६ स्वर तथा अवरोह में ७ स्वर
१९.२.१) षाड़व - षाड़व :- आरोह में ६ स्वर तथा अवरोह में ६ स्वर
१९.२.१) षाड़व - औड़व :- आरोह में ६ स्वर तथा अवरोह में ५ स्वर
१९.३) औड़व
१९.३.१) औड़व - सम्पूर्ण :- आरोह में ५ स्वर तथा अवरोह में ७ स्वर
१९.३.२) औड़व - षाड़व :- आरोह में ५ स्वर तथा अवरोह में ६ स्वर
१९.३.३) औड़व - औड़व :- आरोह में ५ स्वर तथा अवरोह में ५ स्वर
२०.) थाट और राग में अंतर
१. थाट की उत्पत्ति सप्तक के शुद्ध तथा विकृत १२ स्वरों से होती है| राग की उत्पत्ति थाट से होती है|
२. थाट में ७ स्वरों का होना आवश्यक है| राग में कम से कम ५ स्वरों का होना आवश्यक है|
३. थाट के सातों स्वरों को क्रमानुसार होना चाहिए| राग के स्वरों का क्रमानुसार होना आवश्यक नहीं है|
४. थाट में केवल आरोह की आवश्यकता होती है| राग में आरोह और अवरोह दोनों की आवश्यकता होती है|
५. थाट में रंजकता का होना आवश्यक नहीं है| राग में रंजकता का होना आवश्यक है|
६. थाट में वादी- संवादी स्वरों का कोई प्रयोग नहीं होता| राग में वादी - संवादी का होना आवश्यक है|
७. थाट का नाम उससे निकलने वाले प्रसिद्ध राग पर होता है| राग का नामकरण स्वतंत्र होता है|